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इलाज के दौरान 28 वर्षीय महिला की मौत पर परिजनों का आक्रोश, कलेक्टर से लगाई न्याय की गुहार

छत्तीसगढ़ 03 November 2026 (16)

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राजनांदगांव। एक मां ने अपनी 28 वर्षीय बेटी को खो दिया, तो दूसरी ओर एक पति अपनी पत्नी की मौत से टूट गया। परिवार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इलाज के दौरान ऐसा क्या हुआ कि एक सामान्य बीमारी और खून की कमी से जूझ रही महिला की जान चली गई? न्याय की आस लेकर ग्राम पारसबोड़ के करीब 60 से 70 ग्रामीणों के साथ पीड़ित परिवार मंगलवार को जिला मुख्यालय पहुंचा और कलेक्टर जितेंद्र यादव के समक्ष अपनी व्यथा रखते हुए पारख नर्सिंग होम के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

मामला ग्राम पारसाबोड़ निवासी श्रीमती बैसाखीन जोशी (28 वर्ष), पति दीपक जोशी का है। परिजनों के अनुसार, 26 तारीख को खून की कमी की शिकायत पर उन्हें पारख नर्सिंग होम में उपचार के लिए भर्ती कराया गया था। बताया गया कि महिला के शरीर में हीमोग्लोबिन लगभग 6 ग्राम था। अस्पताल में उन्हें दो बोतल खून भी चढ़ाया गया। परिवार का आरोप है कि उपचार के दौरान चिकित्सकीय लापरवाही बरती गई और आयुष्मान कार्ड से इलाज करने के बजाय उनसे नगद भुगतान लेकर उपचार किया गया।

दो डॉक्टरों के अलग-अलग बयान से उठे सवाल

इस पूरे मामले में अस्पताल प्रबंधन और संबंधित चिकित्सकों के बयानों में सामने आया अंतर भी कई सवाल खड़े कर रहा है। पारख नर्सिंग होम के डॉक्टर आदित्य पारख के अनुसार, महिला खून की कमी से पीड़ित थी। उसे दो बोतल खून चढ़ाया गया था। शरीर पर दाने आने के बाद उसे स्किन स्पेशलिस्ट डॉ. सुगंधा गांधी के पास भेजा गया और उनके द्वारा दिए गए प्रिस्क्रिप्शन के आधार पर उपचार किया गया।

वहीं दूसरी ओर, जब स्किन स्पेशलिस्ट डॉ. सुगंधा गांधी से इस संबंध में जानकारी ली गई तो उन्होंने बताया कि महिला उनके पास आई जरूर थी, लेकिन उन्होंने किसी प्रकार का प्रिस्क्रिप्शन नहीं दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि महिला को स्किन डिजीज नहीं थी।

दोनों चिकित्सकों के इन अलग-अलग बयानों के बाद उपचार की वास्तविक स्थिति और महिला को दी गई दवाओं को लेकर सवाल उठने लगे हैं। आखिर किस चिकित्सक की सलाह पर कौन-सी दवाएं दी गईं और उपचार के दौरान मरीज की स्थिति क्यों बिगड़ी, इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी हो गई है।

रेफर करने के दौरान मरीज को बेसहारा छोड़ने का आरोप

परिजनों का आरोप है कि महिला की तबीयत बिगड़ने पर पारख नर्सिंग होम प्रबंधन ने उसे आनन फानन में दूसरे अस्पताल रेफर कर दिया। लेकिन रेफर करते समय मरीज को उचित चिकित्सकीय निगरानी और आवश्यक सहायता उपलब्ध नहीं कराई गई। परिवार ने इसे नर्सिंग होम एक्ट के प्रावधानों के विपरीत बताते हुए अस्पताल प्रबंधन की जिम्मेदारी पर सवाल उठाए हैं।

परिजनों का कहना है कि उन्हें आज तक स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाई है कि आखिर महिला को कौन-सी बीमारी थी और उपचार के दौरान उसकी मौत किन परिस्थितियों में हुई। परिवार अब पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दोषी पाए जाने वालों पर कठोर कार्रवाई चाहता है।

कलेक्टर ने तत्काल लिया संज्ञान, जांच कमेटी गठित करने के निर्देश

न्याय की मांग को लेकर पहुंचे पीड़ित परिवार और ग्रामीणों की बात सुनने के बाद कलेक्टर जितेंद्र यादव ने मामले को गंभीरता से लिया। उन्होंने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ), राजनांदगांव को जांच कमेटी गठित कर मामले की तत्काल जांच कराने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। साथ ही पीड़ित परिवार को आश्वस्त किया कि जांच में जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

अब पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग की जांच रिपोर्ट पर निगाहें टिकी हैं। सवाल सिर्फ एक परिवार को न्याय दिलाने का नहीं, बल्कि निजी अस्पतालों में मरीजों के उपचार, आयुष्मान योजना के क्रियान्वयन, चिकित्सकीय जवाबदेही और रेफर के दौरान मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का भी है। बैसाखीन जोशी की मौत की वास्तविक वजह जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी, लेकिन एक मां और पति की न्याय की गुहार ने स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।


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